छत्‍तीसगढ़ी आलेख: छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति... सुशील भोले

कोनो भी राज या देश के चिन्हारी उहां के भाखा अउ संस्कृति होथे, एकरे सेती ये देश म सन् 1956 म 'राज्य पुनर्गठन आयोग' के स्थापना करे गे रिहिसे, के जे-जे क्षेत्र के अपन अलग भाखा अउ संस्कृति हे, वोमन ल अलग राज के रूप म नवा चिन्हारी दिए जाय। वो बखत छत्तीसगढ़ ल अलग राज के दरजा तो नइ मिल पाइस, फेर इहां के राजनेता अउ जन-प्रतिनिधि मन छत्तीसगढ़ के अपन खुद के भाखा अउ संस्कृति हे कहिके राज्य आन्दोलन चालू कर देइन, जेकर सुखद परिणाम 1 नवंबर 2000 के देखे ले मिलिस, जब छत्तीसगढ़ ल एक अलग राज के दरजा दिए गेइस।

 फेर ये कतेक दुर्भाग्य के बात आय के आज राज बने के एक दशक ले उपराहा बेरा बीत जाये के बाद घलोक हमर भाखा अउ संस्कृति के अलग चिन्हारी नइ बन पाये हे। भाखा के जिहां तक बात हे त राज सरकार के द्वारा तो एला राजभाखा के दरजा दे दिए गे हवय, फेर केन्द्र सरकार ह अभी तक संविधान के आठवीं अनुसूची म एला शामिल नइ करे हे।

जिहां तक संस्कृति के बात हे, त इहां के मूल संस्कृति अउ आज लिखे जावत संस्कृति म कोनो किसम के तालमेल नइ देखे जावत हे, अउ एकर बर सरकार ले जादा दोषी वो लेखक अउ तथाकथित संस्कृति मर्मज्ञ मन हें, जे इहां के मूल रूप के उपेक्षा कर के आने राज मन ले आए लोगन के संस्कृति अउ वोकर मन के ग्रंथ मन के मापदंड म छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल लिखत हें। एकरे सेती ए ग्रंथ मन के मापदंड म लिखे जावत संस्कृति अउ छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति म कोनो किसम के तालमेल नइ दिखत हे।

वाजिब म छत्तीसगढ़ के संस्कृति एक मौलिक संस्कृति आय, जेला हम सृष्टिकाल के या युग निर्धारण के हिसाब ले कहिन ते सतयुग के संस्कृति कहि सकथन। इहां अइसन कतकों परब अउ तिहार हे, जे ए देश के अउ कोनो भाग म न तो जिए जाय अउ न मनाए जाय। कतकों अइसन परब घलोक हे, जेकर मूल रूप ल परिवर्तित कर के आज वोला कोनो आने संदर्भ के संग जोड़े के उदिम करे जावत हे। आवव कुछ अइसने दृश्य मन ऊपर तार्किक ढंग ले चर्चा कर लेइन।

सबले पहिली वो सबले जादा प्रचारित व्यवस्था जेला हम चातुर्मास के नांव म जानथन। अइसे कहे जाथे के चातुर्मास म (असाढ़ अंजोरी एकादशी ले कातिक अंजोरी एकादशी तक) देंवता मन सूत जाथें, तेकरे सेती ए चार महीना तक कोनो किसम के बर-बिहाव या मांगलिक (शुभ) कारज नइ करना चाही। अब इही बात ल छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखिन त ये जनाही के छत्तीसगढ़ म तो ए व्यवस्था ह लागूच नइ होवय। इहां चातुर्मास पूरा होए के दस दिन पहिलीच कातिक अमावस्या के भगवान शंकर अउ देवी पार्वती के बिहाव के परब 'गौरा-गौरी' या 'गौरा पूजा' के रूप म मनाये जाथे। अब जब भगवानेच मन के बर-बिहाव जेठवनी (देवउठनी) के पहिली होगे त फेर उंकर मन के सुतई या फेर ये चार महीना ल मांगलिक कारज खातिर अशुभ कइसे माने जा सकथे? भलुक ये कहना जादा वाजिब होही के चातुर्मास के इही चारों महीना ह छत्तीसगढ़ के संस्कृति म सबले जादा शुभ अउ पवित्र होथे, तेकर सेती जतका शुभ अउ पवित्र कारज हे, वोमन ल इही चारों महीना म करे जाना चाही।

चातुर्मास के ए चारों महीना ल देखिन त सावन अमावस के हरेली, अंजोरी पंचमी के नागपंचमी, अउ पुन्नी के दिन 'शिव लिंग प्रगट' दिवस के रूप म मनाए जाथे। भादो महीना म अंधियारी पाख छठ के स्वामी कार्तिकेय के जनम दिन ल 'कमर छठ' के रूप म, अमावस के नंदीश्वर के जनम दिन ल 'पोरा' के रूप म, अंजोरी पाख के तीज के देवी पार्वती के द्वारा भगवान शंकर ल पति के रूप म पाये  खातिर जेन कठोर तपस्या करे गे रिहिसे तेकर प्रतीक स्वरूप मनाये जाने वाला परब 'तीजा', अउ वोकर बिहान दिन माने चउथ के देव मंडल के प्रथम पूज्य भगवान गणेश के जन्मोत्सव के परब।

इही किसम कुंवार महीना म अंधियारी पाख ल सरग सिधार चुके हमर पुरखा मनके सुरता के परब 'पितर पाख' के रूप म मनाए जाथे। अंजोरी पाख म माता पार्वती (शक्ति) के जन्मोत्सव के परब ल नवरात्र के रूप म मनाए जाथे। (इहां ए जान लेना जरूरी हे, के हमर संस्कृति म नवरात्र परब ल साल म दू पइत मनाए जाथे, वोकर असल कारण हे आदिशक्ति माता के मानव रूप म दू पइत अवतरण लेना। पहिली बेर उन चइत महीना म सती के रूप म आए रिहिन हें, अउ दूसर पइत कुंवार महीना म पार्वती के रूप म। एकरे सेती सिरिफ नवरात्रि परब भर ल साल म दू पइत मनाए जाथे।) 

कुंवार महीना म ही अंजोरी पाख दसमी के समुद्र मंथन ले निकले विष (जहर या दंस) के हरण के परब 'दंसहरा' के रूप म मनाए जाथे। (बस्तर म ए अवसर म जेन रथयात्रा के आयोजन करे जाथे, वो ह मंदराचल पर्वत के माध्यम ले समुद्र मंथन के परब आय। आगू एकर विस्तृत चरचा करबो)। दंसहरा या विषहरण के पांच दिन पाछू फेर कुंवार पुन्नी के अमरित पाये के परब ल 'शरद पूर्णिमा' के रूप म मनाये जाथे। 

इही किसम कातिक महीना म अमावस तिथि के मनाये जाने वाला भगवान शंकर अउ देवी पार्वती के बिहाव के परब 'गौरा-गौरी' म शामिल होए खातिर लोगन ल जेन नेवता दे खातिर उदिम करे जाथे, वोला हम 'सुआ नृत्य' के रूप म जानथन, जेन पूरा अंधियारी पाख भर माने पूरा पंदरा दिन चलथे। ये पंदरा दिन म इहां के कुंवारी कन्या मन 'कातिक स्नान' के परब घलोक मनाथें। माने ये पंदरा दिन उन मुंदराहा ले नहाथें-धोथें, पूजा-पाठ करथें अउ संझा बेरा गौरा-गौरी के खरचा खातिर सुआ नाच के पइसा-कउड़ी, चांउर-दार सकेलथें। इहां के संस्कृति म मेला-मड़ई के रूप म मनाये जाने वाला उत्सव घलोक इहीच महीना माने कातिक पुन्नी ले चालू होथे, जेन ह भगवान शंकर के जटाधारी रूप म प्रगट होय के तिथि महाशिवरात्रि तक चलथे।

चातुर्मास के अंतर्गत हमन 'दंसहरा' के चरचा करत रेहेन। त इहां ए जान लेना जरूरी हे के दंसहरा या दशहरा असल म दंस+हरा=दंसहरा आय। अउ एकर अरथ होथे- 'विष के हरण'। इहां इहू जानना जरूरी हे के दंसहरा (दशहरा) अउ विजय दशमी दू अलग-अलग परब आय। विजया दशमी जिहां आततायी रावण ऊपर भगवान राम के विजय के परब आय, त दंसहरा ह सृष्टिकाल म समुद्र ले निकले विष (दंस) के हरण के परब आय। इही विषपान के सेती भगवान शंकर ल 'नीलकंठ' कहे गेइस, एकरे सेती आज घलो ए दंसहरा तिथि के दिन नीलकंठ पक्षी (टेहर्रा चिरई) ल देखे म शुभ माने जाथे। काबर ते ये दिन वोला भगवान शंकर के प्रतीक अर्थात् 'नीलकंठ' माने जाथे।

बस्तर के 'रथयात्रा' ल वर्तमान म कुछ परिवर्तित कर के वोकर कारण ल अलग रूप म बताये जावत हे, बिल्कुल वइसने जइसे राजिम के प्रसिद्ध मेला ल परिवर्तित कर के 'कुंभ' बना दिए गे हवय, अउ कुलेश्वर महादेव के नांव म भरने वाला मेला ल राजीव लोचन के नांव भराने वाला कुंभ कहे जावत हे। जबकि ये बात ल सबो जानथें के पूस पुन्नी ले महाशिवरात्रि तक चलने वाला मेला-मड़ई सिरिफ शिव स्थल म भराथे।  काबर के ए ह महाशिवरात्रि म प्रगट होने वाला जटाधारी शिव के उत्सव के रूप म होथे, त फेर वो ह राजीव लोचन के नांव म भराने वाला मेला या कुंभ कइसे हो सकथे?

बिल्कुल इही किसम बस्तर के रथयात्रा के मूल स्वरूप अउ कारण ल घलोक बदल दिए गे हवय। पहिली दंसहरा के अवसर म हर बछर नवा रथ बनाए जावय, जे ह असल म मंदराचल पर्वत के प्रतीक स्वरूप होवय। काबर के मंदराचल पर्वत के माध्यम ले ही समुद्र के मंथन करे गे रिहिसे। मंदराचल पर्वत ल मथे (माने आगू-पाछू खींचे) के कारज ल देवता अउ दानव मन मिलके करे रिहिन हें। एकरे सेती ए अवसर म पूरा बस्तर राज के ज मो गांव के देवी-देवता मनला रथयात्रा ठउर म लाये जाथे। एकर पाछू रथ ल आगू-पाछू खींचे जावय, अउ अइसन करई म जब रथ ह टूट जावय त विष निकले के दृश्य उपस्थित करे खातिर ज मो रथ खींचइया मन आंखी-कान मूंद के चारों मुड़ा भागंय। बाद म उन फेर रथ ठउर म जुरियावंय त उनला 'विष पान' के दृश्य उपस्थित करे के प्रतीक स्वरूप दोना मन म 'मंद' दिए जावय। वर्तमान म ये देश म बस्तर के छोड़ सिरिफ कल्लू (मनाली) भर म ए दंसहरा के परब ह जीवित रहि गे हवय, जेला पूरा देश अउ दुनिया म फेर से बगराये के जरूरत हावय।

ए बात ल तो सबो जानथें के समुद्र मंथन ले निकले विष के हरण के पांच दिन पाछू 'अमृत' मिले रिहिसे। एकरे सेती आज घलोक दंसहरा के पांच दिन पाछू अमरित पाये के परब ल 'शरद पूर्णिमा' केे रूप म मनाये जाथे।   

इहां के मूल परब मनला बिगाड़े अउ वोला आने संदर्भ के साथ जोड़ के लिखे के उदाहरण के रूप म हम 'होली' परब ल घलो ले सकथन। छत्तीसगढ़ म जेन होली के परब मनाये जाथे वो ह 'काम दहन' के परब आय, 'होलिका दहन' के नहीं। ए ह काम दहन के परब आय एकरे सेती एला मदनोत्सव या वसंतोत्सव के रूप म घलोक सुरता करे जाथे, जेला माघ महीना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि ले लेके फागुन महीना के पुन्नी तक माने करीब चालीस दिन तक चलथे।

सती आत्मदाह के बाद तपस्या म लीन महादेव जगा ज मो देवता मन कामदेव अउ रति ल ए खातिर भेजथें, के शिव तपस्या ल भंग कर के वोकर अंदर काम-वासना के संचार करे जाय, तेमा उन पार्वती संग बिहाव कर लेवयं, अउ फेर बिहाव के पाछू शिवपुत्र (कार्तिकेय) के जनम होवय। काबर के ताड़कासुर नांव के दानव ह शिवपुत्र के हाथ म मरे के वरदान मांग के अत्याचार करत राहय।

देवमंडल के अनुरोध म कामदेव ह बसंत के मादकता भरे मौसम के चयन कर अपन सुवारी रति संग माघ महीना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि म तपस्या करत शिव तीर जाथे, अउ वासनात्मक नृत्य, गीत अउ दृश्य के माध्मय ले शिव तपस्या भंग करे के उदिम करथे। कामदेव के ये उदिम ह तब सिराथे, जब फागुन पुन्नी के महादेव ह अपन तीसरा नेत्र ल खोल के वोला भसम कर देथे।

छत्तीसगढ़ म बसंत पंचमी (माघ अंजोरी पंचमी) के दिन जेन अंडा या अरंडी नांव के पेंड़ गड़ियाये जाथे, वो ह कामदेव अउ रति के आगमन के प्रतीक स्वरूप होथे। एकरे संग फेर इहां वासनात्मक शब्द, दृश्य अउ नृत्य के माध्यम ले मदनोत्सव या वसंतोत्सव के सिलसिला चालू हो जाथे। ए अवसर म पहिली इहां 'किसबीन नाच' के घलोक रिवाज रिहिसे, जेन ह रति नृत्य के प्रतीक स्वरूप होवय। 'होलिका दहन' के संबंध ह छत्तीसगढ़ म मनाये जाने वाला परब संग कोनो मेर मेल खावत नइ दिखय। होलिका तो एकेच दिन म चिता रचीस, वोमा बइठ के आगी ढिलवाइस अउ खुदे जल के भसम होगे, त फेर वोकर खातिर चालीस दिन तक परब मनाये के सवाले कहां उठथे? अउ ए बखत जेन वासनात्मक शब्द, नृत्य अउ दृश्य देखब म आथे वोकर संग होलिका के का संबंध हे?

मूल संस्कृति के चरचा करत इहां के इतिहास लेखन के चरचा घलोक होना चाही, अइसे मोला लागथे। काबर ते अभी हम सृष्टिकाल के या कहिन सतयुग के संस्कृति के चरचा करत रेहेन, त फेर ये प्रश्न उठथे के छत्तीसगढ़ के इतिहास के जब भी बात होथे त इहां के प्राचीनता ल सिरिफ रामायण अउ महाभारत काल अर्थात त्रेता अउ द्वापर तक ही सीमित काबर करे जाथे? एला सतयुग या सृष्टिकाल तक विस्तारित काबर नइ करंय? जबकि बस्तर के लोक गीत म ए बात के उल्लेख मिलथे के शिवजी देवी पार्वती संग सोलह साल तक बस्तर म रहे हें।

ए संदर्भ म एक कथा मिलथे, जेकर अनुसार भगवान गणेश ल प्रथम पूज्य के आशीर्वाद मिले के बाद वोकर बड़का भाई कार्तिकेय ह रिसा के कैलाश ल छोड़ के दक्षिण भारत म रहे खातिर आ जथे। उही रिसाय काार्तिकेय ल मना के लेगे खातिर शिवजी पार्वती संग इहां सोला बछर तक डेरा डारे रिहिन हें। कार्तिकेय के दक्षिण म रहे के ए बात ले घलोक पुष्टि होथे के दक्षिण भारत म कार्तिकेय के ही सबले जादा पूजा-पाठ अउ मान-गौन होथे। वोला ए क्षेत्र म मुरगन स्वामी या सेनापति मुरगन के रूप म स्मरण करे जाथे।

अब प्रश्न ये उठथे के इहां के तथाकथित इतिहास मर्मज्ञ मनला अतका गौरवशाली अतीत के ज्ञान कइसे नइ हो पाइस? काबर उन इहां के इतिहास ल सिरिफि द्वापर अउ त्रेता तक कैद कर देथें? जिहां तक मैं समझ पाए हौं, त एकर कारण सिरिफ अतके आय के इहां केवल कागज के कतरन बटोरइया मन बड़े-बड़े इतिहास अउ संस्कृति के ज्ञाता होए के चोला ओढ़ लिए हें, एकर ले जादा उंकर कोई औकात नइए। एकरे सेती उन वो ग्रंथ मनके उदाहरण देवत रहिथें, जे मन ल छत्तीसगढ़ के संबंध म नहीं भलुक आने प्रदेश मन के संस्कृति के मापदंड म लिखे गे हवय।

एक अउ बात समझ म आइस के इहां के मूल निवासी मन ह शिक्षा के अंजोर ले बड़ दुरिहा रिहिन हें, एकरे सेती उन अपन इतिहास अउ संस्कृति ल लिखित रूप नइ दे पाइन। एकर परिणाम ए होइस के बाहिर ले आके इहां बसने वाला मन छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ संस्कृति ल लिखित रूप देना चालू करीन। फेर एमा वोमन गड़बड़ी ए कर देइन के अपन संग बाहिर के प्रदेश ले लाने संस्कृति अउ ग्रंथ मन के मापदंड म छत्तीसगढ़ के इतिहास-संस्कृति ल लिखे के उदिम करीन। एकरे सेती उंकर मन के द्वारा लिखे गे इतिहास-संस्कृति ह इहां के मूल इतिहास-संस्कृति संग कोनो मेर मेल नइ खावय।

आज इहां के मूल निवासी मन घलोक पढ़-लिख डारे हें, एकर सेती उन जाने अउ समझे ले धर लिए हें के उंकर मन ऊपर बाहिरी इतिहास  अउ संस्कृति ल थोपे के भरी उदिम रचे गे हवय, जेला अब झटकारे अउ फेंके के उदिम करे के जरूरत हे। अउ अइसन तभे हो सकथे, जब इहां के सांस्कृतिक इतिहास के नवा सिरा ले फेर से लेखन होय अउ वोकर मापदंड आने प्रदेश ले आये लोगन के संस्कृति या उंकर मन के ग्रंथ नहीं भलुक इहां के मूल संस्कृति अउ लोक परंपरा ह बनय। 
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  • कृति- भोले के गोले
  • लेखक- सुशील भोले
  • विधा- निबंध, व्‍यंग्‍य, आलेख, कहानी
  • भाषा- छत्‍तीसगढ़ी
  • प्रकाशक- वैभव प्रकाशन
  • संस्‍करण- 2014
  • कॉपी राइट- लेखकाधीन
  • आवरण सज्जा - दिनेश चौहान
  • सहयोग- छत्‍तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्‍तीसगढ़ शासन
  • मूल्‍य- 100/- रूपये

वरिष्ठ साहित्यकार सुशील भोले जी का संक्षिप्त जीवन परिचय-

प्रचलित नाम - सुशील भोले
मूल नाम - सुशील कुमार वर्मा
जन्म - 02/07/1961 (दो जुलाई सन उन्नीस सौ इकसठ) 
पिता - स्व. श्री रामचंद्र वर्मा
माता - स्व. श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा
पत्नी- श्रीमती बसंती देवी वर्मा
संतान -       1. श्रीमती नेहा – रवीन्द्र वर्मा
                 2. श्रीमती वंदना – अजयकांत वर्मा
                 3. श्रीमती ममता – वेंकेटेश वर्मा
मूल ग्राम - नगरगांव, थाना-धरसीवां, जिला रायपुर छत्तीसगढ़
वर्तमान पता - 41-191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर छत्तीसगढ़
शिक्षा - हायर सेकेन्ड्री, आई.टी.आई. डिप्लोमा 
मोबाइल – 98269-92811  

प्रकाशित कृतियां-

1. छितका कुरिया (काव्य  संग्रह)  
2. दरस के साध (लंबी कविता)
3. जिनगी के रंग (गीत एवं भजन संकलन)
4. ढेंकी (कहानी संकलन)
5. आखर अंजोर (छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति पर आधारित लेखों को संकलन)
6. भोले के गोले (व्यंग्य संग्रह)
7. सब ओखरे संतान (चारगोडि़या मनके संकलन)
8. सुरता के बादर (संस्मरण मन के संकलन)

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